बड़ों की बड़ी बातें
***********************
(1) राष्ट्र का पैसा:-
महात्मा गाँधी जी उन दिनों अपने भाषण के बाद हरिजन फण्ड के लिए चन्दा इकट्ठा किया करते थे। लोग उनकी ओर चल रहे थे और हाथ में पैसे देते जाते थे।
गाँधी जी के हाथ से एक पैसा गिर गया। वे उसे खोजने लगे। धक्का-मुक्की में वह मिल नहीं पा रहा था। लोगों ने उन्हें परेशान देखकर कहा- "बापू ! एक पैसे के लिए इतनी चिन्ता न करें। उसकी क्षति-पूर्ति हम कर देंगे।" पर गाँधीजी उस पैसे को ढूँढते ही रहे और उन्होंने कहा:- "आप और दें, यह अलग बात है, पर जो दिया गया है, उसे सुरक्षित रखना मेरा कर्तव्य है। यह पैसा मेरा नहीं, राष्ट्र का था और जो अमानत मुझे सौंपी गई, उसकी सम्भाल करना मेरा कर्तव्य है।
जो लोग सार्वजनिक पैसे की परवाह अपने निजी पैसे से भी अधिक कर सकते हैं, वस्तुतः वहीं सार्वजनिक सेवा कर सकने के अधिकारी हैं।
(2) नियत कर्तव्यों का पालन:-
क्रान्तिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को जिस दिन फाँसी लगनी थी, उस दिन सवेरे जल्दी उठकर व्यायाम कर रहे थे। जेल के वार्डन ने पूछा आज तो आपको एक घण्टे बाद फाँसी लगने वाली है, फिर व्यायाम करने से क्या लाभ?
बिस्मिल ने उत्तर दिया- " जीवन आदर्शो और नियमों में बँधा हुआ है। जब तक शरीर में साँस चलती है, तब तक व्यवस्था में अन्तर आने देना उचित नहीं है।"
थोड़ी सी अड़चन सामने आ जाने पर जो लोग अपनी दिनचर्या और कार्य व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देते हैं, उनको रामप्रसाद बिस्मिल जी मरते-मरते भी अपने आचरण द्वारा यह बता गए हैं, कि समय का पालन, नियमितता एवं धैर्य ऐसे गुण हैं, जिनका व्यतिक्रम प्राण जाने जैसी स्थिति आने पर भी नहीं करना चाहिए।
(3) अपने सुख के लिए दूसरों को दुख नहीं दें:-
सेवाग्राम में महात्मा गाँधीजी के पास एक कुष्ठ रोगी परचुरे शास्त्री रहते थे। उनके कुष्ठ रोग के लिए किसी ने दवा बताई कि एक काला साँप लेकर हाँडी में बन्द किया जाय फिर उस हाँडी को कई घण्टे उपलों की आग में जलाया जाय। जब साँप की भस्म हो जाय तो उसे शहद में मिलाकर खाने से कुष्ठ अच्छा हो जाएगा।
गाँधी जी ने पूछा- "क्या आप ऐसी दवा खाने को तैयार हैं?" शास्त्री जी ने उत्तर दिया- "बापू! यदि साँप की जगह मुझे ही हाँडी में बन्द करके जला दिया जाय, तो क्या हानि है? साँप ने क्या अपराध किया है कि उसे इस प्रकार जलाया जाए?"
परचुरे शास्त्री की वाणी में उस दिन मानवता की आत्मा बोली थी। वे लोग जो पशु पक्षियों का माँस खाकर अपना माँस बढ़ाना चाहते हैं, इस मानवता की पुकार को यदि अपने बहरे कानों से सुन पाते तो कितना अच्छा होता?
( संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति मार्च 1946 पृष्ठ 30
No comments:
Post a Comment