ऋषि चिंतन
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कठिनाइयों का स्वागत कीजिए
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👉 जब तक यह शरीर बना हुआ है तब तक सुख और दु:ख का निवारण नहीं हो सकता । *"कठिनाइयाँ" जीवन का उसी तरह अंग हैं, जिस तरह दिन के बाद रात्रि का होना, ऋतुएँ बदलते रहना ।* अतः आवश्यकता इस बात की है कि कठिनाइयों या प्रतिकूलताओं को अपने ऊपर हावी न होने दिया जाए और उनके बीच से रास्ता निकालकर आगे बढ़ते रहा जाए ।
👉 *कठिनाइयों को अपने ऊपर हावी न होने देने का एक मार्ग व्यस्त रहना है ।* मनुष्य के व्यस्त रहने से कठिनाइयों के प्रति शोक, चिंता एवं उद्विग्नता में डूबने के लिए समय ही नहीं मिलेगा । *स्वामी विवेकानंद ने एक स्थान पर लिखा है - "व्यस्त मनुष्य को आँसू बहाने के लिए भी समय नहीं मिलता ।"* यह ठीक भी है । जो व्यस्त रहेंगे, उन्हें कठिनाइयों के संबंध में सोच-सोच कर दु:खी होते रहने का अवकाश ही कहाँ रहेगा ? इसके अतिरिक्त इन्हें जीवन का एक सहज क्रम मानकर भी निश्चिंत रहा जा सकता है । *यह सोचकर भी प्रसन्न हुआ जा सकता है कि आपत्तियों का झंझावात नरसिंहों को झकझोरकर उनका प्रमाद तोड़कर उन्हें पुरुषार्थ के लिए खड़ा कर देता है ।*
👉 *"विपत्तियाँ," "प्रतिकूलताएँ" अथवा "कठिनाइयाँ" जीवन का सहज स्वाभाविक कर्म है ।* उनसे प्रभावित होना ही हो तो इस रुप में होना चाहिए कि वे मनुष्य को शिक्षा देने के लिए आती हैं । इसलिए उनसे न तो भयभीत होने की आवश्यकता है और न भागने की ।
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