भारतीय बालकों की शानदार परम्परा
(भाग 1)
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(1) शिवाजी के पिताजी शाह जी बीजापुर नवाब के दरबार में कर्मचारी थे। वे अपने आठ वर्ष के शिवाजी को दरबार में लेकर गए और कहा:- "बेटा! बादशाह को सलाम करो।"
शिवाजी ने दो टूक मना कर दिया कि मैं मुसलमान के आगे सिर नहीं झुका सकता। नवाब की त्यौंरी बदल गई, पर शिवाजी विचलित न हुए। वे उल्टे पैर लौट आए, पर झुके नहीं।
(2) एक ग्रामीण बालक को एक बड़ा फोड़ा निकला। उन दिनों देहातों में डॉक्टरी इलाज का चलन न हुआ था। मामूली जानकार लोग ही इलाज कर लेते थे। फोड़ों का इलाज उसे लोहे की गर्म सलाखों से दाग कर किया जाता था।
बालक के फोड़े का इलाज भी देहाती वैद्य ने लोहे की सलाखों से जलाना ही बताया। सलाखें आग से लाल हो गई, पर दागते समय देहाती वैद्य रुक गया कि यह बालक बहुत छोटा है, डरने से कुछ बुरी बात न हो जाय।
वैद्य असमंजस में ही था, कि बालक ने वैद्य को कहा:- " लोहा ठण्डा हुआ जा रहा है, आपको डर लगता हो, तो मुझे आज्ञा दो! मैं अपने आप अपना फोड़ा जला लूँगा।" देखने वाले दङ्ग रह गए। बालक का फोड़ा कई जगह से जलाया गया, पर उसके चेहरे पर शिकन तक न आई।
यह बालक आगे चलकर देश का प्रमुख नेता हुआ, काँग्रेस का प्रधान और भारत का गृह मंत्री भी। इसका नाम था- सरदार वल्लभभाई पटेल।
(3) एक बालक दौड़ता हुआ डॉक्टर के पास पहुँचा और उनसे अत्यधिक आग्रह करके एक रोगी को दिखाने ले गया। डॉक्टर ने देखा- सड़क पर एक कुत्ता घायल पड़ा है। उसी के इलाज के लिए उसे लाया गया है।
इस पर डॉक्टर बहुत झल्लाया पर बालक भी अपनी आन का पूरा था। उसने कहा - " मनुष्य के समान ही कुत्ते को भी कष्ट होता है। हम मनुष्यों का ही दुःख दूर करें और दूसरे प्राणियों का नहीं, क्या यह उचित है?"
डॉक्टर झेंपा, उसने कुत्ते को दवा लगाई। कुछ दिन में वह कुत्ता अच्छा भी हो गया। इस सहृदय बालक का नाम था- महामना मदन मोहन मालवीय।
( संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति मार्च 1946 पृष्ठ 39
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