हमारी अंतश्चेतना ही वास्तविक देवी है
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साथियो! मैं आपको एक बात बताना चाहूँगा कि मनुष्य जीवन कैसा ऊबड़ -खाबड़, बेघड़, कुसंस्कारी है। हमारा जीवन कैसा संस्कारविहीन, दिशाविहीन, लक्ष्यविहीन, क्रियाविहीन, अनुशासनविहीन और अस्त- व्यस्त है। इन चीजों को अगर ठीक तरीके से बना लिया जाए, विचारणाओं को अगर ठीक तरीके से बना लिया जाए, भावनाओं को ठीक तरीके से बना लिया जाए क्रियाशक्ति को ठीक तरीके से बना लिया जाए तो मित्रो! हम कैसे सुंदर हो सकते हैं? हम कैसे सुघड़ हो सकते हैं? मैं आपको क्या बताऊँगा, मैं तो एक ही शब्द में कह सकता हूँ कि अगर आपने चमत्कार वाली बात सुनी हो, लाभ वाली बात सुनी हो, वरदान वाली बात सुनी हो, आशीर्वाद वाली बात सुनी हो, वैभव वाली बात सुनी हो, अध्यात्म की महत्ता वाली बात सुनी हो, अक्ल की बात सुनी हो, अध्यात्म की कभी कोई गरिमा आपने भी सुनी हो, वरदान और आशीर्वाद वाली बात आपने सुनी हो तो समझना कि ये सारी की सारी विशेषताएँ जो बताई जा रही हैं, वे आदमी की अंतश्चेतना के विकसित स्वरूप की बताई जा रही हैं और किसी की नहीं बताई जा रही हैं। देवी की बताई जा रही हैं। तो चलिए देवी क्या हो सकती है? यह बताता हूँ आपको। हमारी अंतश्चेतना के अलावा कोई देवी नहीं है। हमारी अंतश्चेतना जब विकसित होती है तो कैसी हो जाती है? ऐसी हो जाती है जिसको सिद्धि कहते हैं, जिसको हमको सँभालना और सँजोना आता है, इसे जीवन में हम संस्कृति कहते हैं। सभ्यता कहते हैं। जीवन में साधना इसी को कहते हैं। नाई क्या करता है? नाई हमारी हजामत बना देता है और हमें ऐसा बना देता है जैसे मूँछें अभी निकली ही नहीं। यह मिरैकिल- जादू है, हजामत बनाने वाले का। हमको खूबसूरत बनाने वाले का। दर्जी, जो हमारे फटे- पुराने से कपड़े थे, उनका कुरता बना देता है। जॉकेट बना देता है। अरे बेटे, यह कपड़ा तो वही है ढाई गज, जो सवेरे पड़ा हुआ था। अब कैसा सुंदर बना हुआ है? कमाल है। यहाँ भी बटन यहाँ भी कच्चा। यहाँ भी गोट। यहाँ भी बाजू। देख ले ये किसका कमाल है? दर्जी का कमाल। है अभी कैसा था कपड़ा? मैला- कुचैला उलटी- सीधी सिलवटें पड़ी हुईं थी। नील लग करके आ गई। टिनोपाल लग करके आ गया। ये क्या चीज है? ये चमत्कार है। ये साधना है। कपड़े की साधना किसकी है? ये धोबी की साधना है। मूर्तिकार की साधना है? पत्थर का एक टुकड़ा नाचीज सा छैनी और हथौड़े को लेकर के मूर्तिकार जा बैठा और घिसने लगा, ठोकने लगा, घिसने और रगड़ने लगा। दो- चार दिन पीछे ऐसी बढ़िया लक्ष्मी की मूर्ति बन गई कि मालूम नहीं पड़ा कि यह वही पत्थर का टुकड़ा है, कि लक्ष्मी जी हैं। बेटे ये क्या है? ये साधना है और क्या है?
अभी आपको मैं साधना का महत्त्व बता रहा था। ये घटिया वाली जिंदगी, बेकार जिंदगी, पत्थर जैसी जिंदगी को आप बढ़िया और शानदार बना सकते हैं। सोने का एक टुकड़ा ले जाइए साहब! अरे हम क्या करेंगे? कहीं गिर पड़ेगा। अच्छा तो अभी हम आते हैं। उसका क्या बना दिया? ये कान का बुंदा बना दिया। ये अँगूठी बना दी, मीना लगी हुई। अरे साहब बहुत सुंदर बन गया है यह। क्या यह वही टुकड़ा है? हो यह सुनार का कमाल है। सुनार की साधना है। उसने खाबड़- खूबड़ धातु के टुकड़े को कैसी सुंदर अँगूठी बना दिया, कैसा जेवर बना दिया? कैसा नाक का जेवर बना दिया? कैसा कैसा जेवर बना दिया? ये हमारी जिंदगी, बेतुकी जिंदगी, बेसिलसिले की जिंदगी। बेतुकी जिंदगी। बेहूदी जिंदगी को हम जिस तरह से सँभाल पाते हैं- साधना इसका नाम है। असल में साधना इसी का नाम है। वह जो हमने अभ्यास कराया था शुरू में कि आपको तमीज सिखाएँ और तहजीब सिखाएँ। कौन सी? मैं इसको बताऊँगा कि पालथी मारकर बैठ। अरे तमीज से सीख। कभी ठीक काम करता है, कभी अक्ल से काम करता है, कभी नहीं करता है। कमर ऐसी करके बैठना। हाँ साहब, ऐसे ही करके बैठूँगा। मटक नहीं, सीधे बैठ। मचक- मचक करता है। मित्रो! ये सारे के सारे अनुशासन, सारी की सारी डिसीप्लीन, यह आज का विषय नहीं है। कभी समय मिला तो आपको बताऊँगा कि आपको जो भी साधना के बहिरंग क्रिया- कलाप सिखाते हैं। आखिर क्या उद्देश्य है इनका? क्रिया का कोई उद्देश्य होना चाहिए। क्यों साहब, पालथी मारकर क्यों बैठते हैं? पद्मासन में क्यों बैठते हैं, हम तो ऐसे ही बैठेंगे, टाँग पसारकर। नहीं बेटे, टाँग पसारकर मत बैठिए। नहीं साहब हम तो टाँग लंबी करेंगे, इसको छोटी करेंगे, नहीं बेटे, ये भी गलत है। नहीं हम तो यूँ माला जप करेंगे। सिर के नीचे तकिये लगाकर। नहीं बेटे, ऐसे मत करना। ये ठीक नहीं है। यह क्या है? डिसीप्लीन है। साधना के माध्यम से हम अपने व्यावहारिक जीवन को किस तरीके से अनुशासित रूप दे सकते हैं, किस तरीके से उसे ढाल सकते हैं, किस तरीके से अपने कमी को, अपने विचारों को अपनी इच्छाओं को, आस्थाओं को परिष्कृत एवं अनुशासनबद्ध कर सकते हैँ, क्रमबद्ध कर सकते हें। असल में साधना इसी का नाम है।
स्वर्णकार के तरीके से, कलाकार के तरीके से, गायक के तरीके से और वादक के तरीके से जो अपने को साध लेता है। उसे ही सच्चा साधक कहा जाता है। उसकी ही सही रागिनी निकलती है। सुर निकलता है। कैसे निकलता है? बा ! अरे बेटे ये क्या बोलता है? यूँ मत बोल। तो फिर कैसे बोलूँ? तू ऐसे बोल, जैसे कि भैरवी रागिनी गाई जाती है। गुरुजी सिखाइए। बेटा तू आ जाना हमारे पास, हम तुझे सिखाएँगे नया राग सिखाएँगे। अब तू ऐसे बोल जैसे कोयल बोलने लगती है, अभी तू जैसे चिल्ला रहा था इसे सुर नहीं कहते। बेटे, ऐसे फिर मत बोलना। सुर को, गले को इस तरीके से साध कि ऐसी मीठी- मीठी आवाज आए कि बस मजा आ जाए और ये धागे और तार जो सितार में बँधे हुए थे, उन्हें हिला। इसे भन- भन- भन के तरीके से नहीं, हम जैसे बताएँ उस तरीके से बजा। इस तार के बाद उसे बजा, इसके बाद इसे बजा, फिर देख किस तरीके से इसमें से कैसी- कैसी सुरलहरी निकलती है, तरंगें निकल सकती हैं। कैसी- कैसी ध्वनि निकल सकती हैं? जिन पर तू थिरकने लगेगा और नाचने लगेगा, तो महाराज जी ये कैसे बजेगा? बेटे यह एक साधना है, किसकी? धागों की, तारों की। यह किसकी है साधना? गले की। यह है साधना पत्थर की। ये किसकी है साधना? हर चीज की है। सोने की साधना, मुख की साधना और जीवन की साधना कि इसे कैसे जिया जा सकता है? जीवन कैसे उद्यमशील बनाया जा सकता है? इसे कैसे देवोपम बनाया जा सकता है? जीवन की अस्तव्यस्तता का उदारीकरण कैसे किया जा सकता है? जीवन ठीक तरीके से कैसे जिया जा सकता है? अगर ठीक तरीके से आप इसे जान पाएँ तो बेटे आप धन्य हो सकते हैं, सब कुछ बन सकते हैं। आप बाहर का ख्याल निकाल दीजिए जो चीज बाहर दिखाई पड़ती है, वास्तव में वह भीतर से ही आती है। बाहर तो उसकी खुशबू, बिखरती चली जाती है। जैसे कस्तूरी हिरण की नाभि में होती है, परंतु उसे यह मालूम पड़ता है कि हवा में से पूरब से वह आती है। पश्चिम से आ रही है। बेटे, सुगंध कहीं बाहर से नहीं आती? भीतर से निकलती है।
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