जीवन की सार्थकता
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जीवन की सार्थकता का रास्ता एक ही है कि अमीरी और लिप्सा पर अंकुश लगाकर औसत नागरिक स्तर का निर्वाह क्रम अपनाया जाय। उतना जुट जाने पर पूरा-पूरा संतोष किया जाय। इसके उपरान्त जो भी बचा रहता है उस समूचे को ऐसे उपक्रम में नियोजित किया जाय, जिससे मानवी गरिमा का अभिवर्धन होता हो। आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का उभय पक्षीय प्रयोजन सधता है। इस निर्धारण में भी यह देखना होता है कि सामयिक आवश्यकता पर ध्यान रखते हुए जो सर्वप्रथम सँभालने सुधारने योग्य है उसी को हाथ में लिया जाय। पड़ोस में आग लगने पर भोजन पकाने जैसा आवश्यक काम भी पीछे कभी के लिए छोड़ना पड़ता है। कितने ही काम सामने हो तो उसमें बुद्धिमानी का कदम यह होता है कि प्राथमिकता देने और पीछे धकेलने की एक सुव्यवस्थित शृंखला बनाई जाय। इसका निर्धारण ही सुव्यवस्था कहा जाता है। इस क्रम को बिगाड़ देने पर पूरा परिश्रम करने पर भी बात बनती नहीं और समस्याएँ सुलझने के स्थान पर और भी अधिक उलझ जाती है। इन दिनों प्रत्येक विज्ञजन के लिए करने योग्य सामयिक कार्य एक ही है, कि लोक मानस के परिष्कार का महत्त्व समझा जाय और आस्था संकट का निवारण करने के लिए प्राण प्रण से जुट पड़ा जाय। इस एक ही व्यवधान के समाधान पर समय की समस्त गुत्थियों का सुलझ सकना निर्भर है।
यह सब अनायास ही संभव नहीं हो सकता। इस श्रेय पथ पर चल सकना मात्र उन्हीं के लिए संभव है, जो अपनी आकांक्षा उत्कंठा को तृष्णा से हटाये और उसे उतनी ही भावना पूर्वक श्रेय साधना के लिए लगायें। यह आन्तरिक परिवर्तन ही बाह्य क्षेत्र में वह सुविधा उत्पन्न कर सकता है, जिसके सहारे शरीर निर्वाह की तरह ही आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का महान प्रयोजन बिना किसी के, नितान्त सरलतापूर्वक सधता रहे। परमार्थ परायणों में से एक भी भूखा, नंगा नहीं रहा। उनके पारिवारिक उत्तरदायित्वों में से एक भी रुका नहीं पड़ा रहा। तरीके अनेकानेक हैं। अपना सोचा हुआ तरीका ही एक मात्र मार्ग नहीं है। नये सिरे से नये उपाय सोचने पर ऐसे समाधान हर किसी को उपलब्ध हो सकते हैं जिनमें से साँप मरे न लाठी टूटे। निर्वाह किसी के लिए समस्या नहीं। कठिनाई एक ही है-अनन्त वैभव की लिप्सा और कुटुम्बियों को सुविधा सम्पदा से लाद देने की लालसा। यदि परिवार के समस्त सदस्यों को श्रमजीवी, स्वावलम्बी बनाने की बात सोची जाय, औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार किया जाय तो इतने भर से जीवन को सार्थक बनाने वाली राह मिल सकती है। प्रश्न एक ही है कि शरीर के लिए जिया जाय या आत्मा के लिए। दोनों में से एक को प्रधान एक को गौण मानना पड़ेगा। यदि आत्मा की वरिष्ठता स्वीकार की जा सके तो उन प्रयोजनों को पूरा करना पड़ेगा, जिनके लिए सृष्टा ने यह सुर दुर्लभ अवसर उच्चस्तरीय उपयोग के निमित्त प्रदान किया है।
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